ज़िन्दगी एक सफर · रास्तों कर यारी

फकीरा

मंजिल की तलाश में भटके ओ फकीरा, तू ही है तलाश तेरी मंजिल की.

है आदत जो तुझे खुद को आज़माने की, तो फिक्र ना कर इस ज़माने की.

कभी गिरे तो फिर से उठ जा, क्या वजह है यूँ आँसू बहाने की.

ज़माना तो यूँही कहता है तू काबिल ही नहीं, क्या फायदा किस्मत आज़माने की.

पर तू मानता कहाँ है, चाह जो है तुझे कुछ कर दिखाने की.

ये जो रास्ते से यारी है तेरी, फिर क्या वजह लड़खड़ाने की.

मंजिल की तलाश में भटके ओ फकीरा, तू ही है तलाश तेरी मंजिल की.

~प्रि yaम्vaदा
© ALL COPYRIGHTED RESERVED

Image Source- Google